الجمعة، 12 يونيو 2026

لم يكن بقلم رنا عبدالله

 لم يكن


بُعدي اختياراً..


أو جفاءً..


يا حبيبي..


أو قِرارا..


بل هو الموجُ..


الذي ألقى..


بقلبي..


في المتاهاتِ..


وحارا..


​يا محباً..


صاغَ من عتَبٍ..


نشيداً..


ملأَ الدنيا..


انكسارا..


كيف ترضى..


أن تراني..


في حكايا العشقِ..


وهماً..


أو غُبارا؟!


​لم أغادرْ..


عن ملالٍ..


إنما الأيامُ..


شادتْ..


بيننا سوراً..


ونارا..


وتركتني..


في شتاتِ البُعدِ..


أقضي..


ليليَ الباكي..


نهارا..


​أيُّ حبٍّ..


لو غدتْ..


كلُّ الظنونِ..


خناجراً..


تأبى الحِوارا؟


أيُّ حبٍّ..


إن غدا الإعصارُ..


يمحو..


خلفَهُ..


خُضرَ الديارا؟


​لم يكنْ..


بُعدي رخيصاً


..


بل وربِّي..


كانَ دمعاً..


كانَ نزفاً..


واحتِضارا!


بقلم الشاعرة /رنا عبد الله

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لم يكن بقلم رنا عبدالله

 لم يكن بُعدي اختياراً.. أو جفاءً.. يا حبيبي.. أو قِرارا.. بل هو الموجُ.. الذي ألقى.. بقلبي.. في المتاهاتِ.. وحارا.. ​يا محباً.. صاغَ من عتَ...