لم يكن
بُعدي اختياراً..
أو جفاءً..
يا حبيبي..
أو قِرارا..
بل هو الموجُ..
الذي ألقى..
بقلبي..
في المتاهاتِ..
وحارا..
يا محباً..
صاغَ من عتَبٍ..
نشيداً..
ملأَ الدنيا..
انكسارا..
كيف ترضى..
أن تراني..
في حكايا العشقِ..
وهماً..
أو غُبارا؟!
لم أغادرْ..
عن ملالٍ..
إنما الأيامُ..
شادتْ..
بيننا سوراً..
ونارا..
وتركتني..
في شتاتِ البُعدِ..
أقضي..
ليليَ الباكي..
نهارا..
أيُّ حبٍّ..
لو غدتْ..
كلُّ الظنونِ..
خناجراً..
تأبى الحِوارا؟
أيُّ حبٍّ..
إن غدا الإعصارُ..
يمحو..
خلفَهُ..
خُضرَ الديارا؟
لم يكنْ..
بُعدي رخيصاً
..
بل وربِّي..
كانَ دمعاً..
كانَ نزفاً..
واحتِضارا!
بقلم الشاعرة /رنا عبد الله

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